ग़ज़ल

                   
                  ग़ज़ल

मुझको दर पेश वो सफ़र आया
जिसमें साया न ही शजर आया

इक  परिंदा  ज़मीन  पर  आया
हर  परिंदे  के  पर  कतर आया

जब गया एक बार अह्दे शबाब
लौट कर फिर न उम्र भर आया

लौटते  वक्त  जां  का   नज़राना
उनकी दहलीज़ पर मैं धर आया

उड़  गए  होश  माहो  अंजुम  के
जब  मिरा  चांद  बाम  पर  आया

बावफ़ा  हो  के  बेवफ़ाई   का
हाय   इल्ज़ाम  मेरे  सर  आया

अह्दे  माज़ी  के  याद  आते  ही
मेरी  आंखों  में  ख़ूं  उतर  आया

मुद्दतों   बाद   शुक्र   है   मुझ  पर
प्यार  भी  उनको  टूट  कर  आया

इसकी  इरफ़ान  हो  गयी  मेअराज
इश्क़  जब  जब  भी  दार पर आया
        इरफ़ान नोमानी
बासनी नागौर राजस्थान

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