गंगा जमनी तहज़ीब की हिफाज़त हम सबकी ज़िम्मेदारी
मादरे वतन प्यारा हिंदुस्तान जो कि मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब के मानने वाले लोगों। अलग अलग तहज़ीब व सक़ाफ़त का चलन रखने वालों और कई तरह की बोलियाँ और ज़बाने बोलने वाले लोगों का मस्कन और गढ़ है । एक सर्वे के मुताबिक यहां बोली जानी वाली ज़बानों की तादाद तक़रीबन 427 है। जिनमें कुछ ज़बानें ऐसी हैं जो अपनी नुमायां ख़ुसुसियात की वजह से अपनी अलग पहचान रखती हैं। वतने अज़ीज़ की सबसे मुमताज़ ख़ूबी और ख़ूबसूरती ये है कि हर शख्स चाहे वो किसी भी। मज़हब व मिल्लत का हो। बिना किसी रोक टोक के अपने तौर पर अपने त्योहार जश्न और ख़ुशी मना सकता है। यहां की गंगा जमनी तहज़ीब आपसी भाई चारा मेलजोल और साम्प्रदायिक सौहार्द अपने आप में इतने बेमिसाल हैं जो इसकी ख़ूबसूरती में चार चांद लगाते हैं। माज़ी क़रीब में तारीख के झरोखे से झांक कर जब हम देखेंगे तो इसकी दो चार पांच दस ही नहीं बल्कि अनेकों मिसालें मिल जाएंगी। जो क़ौमी एकता और अखंडता को दर्शाने के लिए बहुत काफ़ी हैं। युगों युगों से सूफ़ी संतों पीरों फ़क़ीरों दरवेशों और किसानों के इस देश में। गंदी सियासत का चेलेंज हर दौर में सबके सामने आया मगर। जिस तरह से एक इंसान ज़िन्दगी भर मेहनत कर के पाई पाई जोड़ कर अपनी हैसियत के मुताबिक बड़े अरमानों से घर बनाता है। लेकिन अब उस घर की हिफाज़त भी तो वही करता है। और अपनी औलाद को वसीयत व नसीहत भी यही करता है। कि देखो ज़िन्दगी में कभी और किसी हाल में भी घर मत टूटने देना। इसका मतलब साफ़ तौर पर यही होता है कि वो ईंट पत्थर गारे रेती चूना या सरिया की बात नहीं कर रहा है! वो अस्ल में अपनी औलाद को बता रहा है कि घर तो मैंने बना दिया। अब ये जैसा भी है लेकिन ख़ूबसूरत है। और ख़ूबसूरत भी हम सब की वजह से है। अगर इसमें हम प्यार मोहब्बत के साथ एक होकर रहेंगे तो ही ये ख़ूबसूरत भी कहलाएगा। टिका रहेगा और घर भी कहलाएगा वर्ना आपसी अनबन नफ़रत और झगड़े फ़साद से ये टूट कर बिखर जाएगा। फिर ये किसी खंडहर और वीराने की तरह ही हो जाएगा। इसी एक छोटी सी मिसाल के पेशे नज़र आप इतिहास का जायज़ा लें। अंग्रेज़ी हुकूमत जिसने सबसे पहले यहां नफ़रत के बीज बोये और वक्ती तौर पर उन्हें कामयाबी भी मिली और हुकूमत भी। लेकिन गंगा जमनी तहज़ीब क़ौमी एकता और भाईचारा के जो लोग शैदा और मतवाले थे। उन्होंने अपनी
सूझबूझ सोच समझ अक़्ल और दूर अंदेशी से अंग्रेज़ी पालिसी और उनकी चालों को भांप कर। ठीक उसी इंसान जिसने अपनी औलाद को अपने घर की ख़ूबसूरती उसकी हिफाज़त और टूटने से बचाने की नसीहत की थी। वैसे ही । पूरी एकता की ताक़त को झोंकते हुए। ब्रिटिश हुकूमत को मुंह तोड़ जवाब दिया। और ये पैग़ाम भी कि ये मुल्क हमारा है। हमारा हम सबका है। हमें इसकी हिफाज़त करनी है। और आने वाली नस्लों के लिए। वो रास्ते साफ़ करने हैं। जिन रास्तों में तुमने कांटे बिछाए हैं। बल्कि याद रक्खो तुमने तो नफ़रत के कांटे बोये हैं। मगर हम अपने बुजुर्गों की तरह मोहब्बत के फूल खिलाएंगे। और फिर हुआ भी यही तारीख़े जंगे आज़ादी आज भी गवाह है। कि मोहब्बत और भाईचारे के झंडे लेकर चलने वाले उन जियालों ने वो इंकलाब बरपा किया कि अंग्रेज़ी हुकूमत के पांव उखड़ गये। इंकलाब जिंदाबाद की सदाएं हर तरफ़ गूजी जिसने गोरों की ईंट से ईंट बजा कर ही दम लिया। नफ़रत और ग़ुलामी के महल ज़मीं दोज़ हो गये। और मोहब्बत भाईचारा और आज़ादी का क़िला तामीर हुआ। आज़ादी के उन मतवालों और मोहब्बत के फ़िदाकारो का लहू इतिहास के पन्नों की आज भी ज़ैब व ज़ीनत है और पुकार पुकार के कहता है कि
ख़ूने जिगर से सींचा है हम तश्ना लबो ने
तब जा के इस अंदाज़ का मयखाना बना है।
इंसानियत नवाज़ी की अनूठी मिसाल
बीकानेर के राजा गंगा सिंह जी महाराज के घराने में अपनी बेटी की शादी थी इत्तेफ़ाक की बात कि शादी की तारीख़ के दिन 10-मुहर्रम यानी आशूरा का दिन था। अब जब तारीख क़रीब आने लगी तो महाराज को ये फ़िक्र हुई। कि मुहर्रम के दिनों में मुसलमान आम तौर पर शादी नहीं करते न ख़ुशी मनाते हैं। इसलिए कि ये नबी के नवासे सैय्यदना इमामे हुसैन की शहादत के दिन हैं। जिन्होंने तीन दिन तक
अपने घरवालों के साथ कर्बला में भूखे और प्यासे रह कर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ जंग लङी और अपनी आख़री सांस तक न ख़ुद झुके न सच को झुकने दिया। महाराज इसलिए भी परेशान थे कि तारीख़ तय करते वक्त एक तो इसका ख़्याल शायद ज़ेह्न में नहीं आया। दूसरा ये कि शादी की दावत अगर सबको देता हूं तो मेरी प्रजा में एक अच्छी ख़ासी तादाद मुस्लिम भाईयों की है। जिनके यहां मुहर्रम के दस दिनों में शादी होती ही नहीं। दूसरी बात मैं इनको ये ख़ुशी की दावत दूं तो किस तरह?? जबकि इनके दिलों में तो अपने नबी के नवासे की शहादत का ग़म होगा!!!
बस फिर क्या था। महाराज ने अपने मुशीरों से मशविरा किया कि कोई तजवीज़ निकाली जाए। सबने राय दी कि महाराज इस सूरत में ये किया जाए कि शादी आप शहर में अपने महल में करने की बजाए शहर से बाहर किसी और जगह करें। इस तरह से शादी भी सही से हो जाएगी और मुस्लिम भाइयों के दिल भी नहीं टूटेंगे। महाराज को ये राय इतनी पसंद आई कि उन्होंने इस पर फौरी तौर पर अमल करने का फ़ैसला लिया। और शादी और उसके सारे प्रोग्राम गजनेर जो कि बीकानेर से 50 किलोमीटर दूर है वहां पर करने का हुक्म दिया। याद रहे ये वही महाराज गंगा सिंह जी थे। जिन्होंने यहां के मुस्लिम भाईयों (कुरेशी बिरादरी) के लिए गोश्त की दुकानें कुछ फ़ासले पर बनवा के दीं। ताकि वो हिंदु भाई जो गोश्त से परहेज़ करते थे उन्हें कोई परेशानी या तकलीफ न पहुंचे। और मुस्लिम भाईयों का रोज़गार भी चलता रहे। शायद ये उन्हीं मेहनतों का नतीजा है कि बीकानेर की फ़िजा आज भी। फ़िरक़ा वाराना तसादुम आपसी मन मुटाव। क़ौमी रंजिशों व झगड़ों से पाक है। लोग इतनी मोहब्बत भाईचारा और प्यार से आपस में रहते हैं जिसकी मिसाल नहीं मिलती।।
ऐ काश कि हम में से हर शख़्स मोहब्बत के इस जन्नत नुमा गुलशन की भी इसी तरह फ़िक्र करे जैसे बुजुर्गों ने की है। और जो हमें उन्होंने सिखाया भी है।
क्या हम एक चिड़िया से भी गये गुज़रे हैं?
एक बार किसी जंगल में आग लग गई और वो फैल गई जिसने देखते ही देखते सारे जंगल को अपनी चपेट में ले लिया। जंगल के सारे जानवर एक जगह इकट्ठा हो कर मुरत बने हुए उस आग की तरफ़ देख रहे थे। कि अब क्या होगा। और हैरत तो ये कि उन तमाशा देखने वालों में शेर भी था। सबके मुंह पर हवाइय्यां उड़ रही थी। थोड़ी देर में सबने देखा कि एक छोटी सी चिड़िया जिसकी चोंच में पानी की दो तीन बूँदें थीं। उसने वो बूँदें उस आग में डाली। और फिर नदी की तरफ़ उड़ कर गई। फिर आग पर ला के कुछ क़तरे पानी के उसने छिड़क दिये। वो बार बार यही कर रही थी। जाती पानी के कतरे लाती। और आग पे डाल देती। तो शेर ने देख कर उसका मज़ाक़ उड़ाया कि देखो ये चिड़िया पागल हो गई। भला जंगल में फैली हुई इस आग पर इसकी चोंच के चंद क़तरे पानी भला क्या असर करेंगे? बे वक़ूफ बेकार ही मेहनत कर के वक्त बर्बाद कर रही । चिड़िया ने शेर की इस बात का जो जवाब दिया वो वाक़ई क़ाबिले तारीफ़ भी है। और लायक़े तक़लीद भी। उसने शेर सा कहा कि बात बिल्कुल सही और दुरूस्त है कि। इस आग को बुझाने के लिए इन पानी के चंद क़तरों की न कोई हैसियत है न हक़ीक़त बल्कि ये तो कुछ भी नहीं। लेकिन एक बात मत भूलो कि कल जब तारीख़ लिखने वाला इस जंगल की तारीख़ लिखेगा तो मेरा नाम आग लगाने वालों में नहीं बल्कि आग बुझाने वालों में लिखेगा। और मैंने तुम्हारी तरह चुपचाप रह कर तमाशा नहीं देखा बल्कि अपनी हैसियत के मुताबिक कोशिश की है !!! इत्मिनान के लिए इस से बढ़कर और क्या चाहिए??? ज़मीर को जगाने वाली चिड़िया की इस बात को सुन कर सब सन्न रह गये।। मगर यही सवाल हम कभी ख़ुद से भी पूछें। कि हमारे बुजुर्गों ने क्या किया और हम क्या कर रहे हैं। इंसान का दिल और ज़मीर सबसे बड़ी अदालत होते हैं। अगर जवाब ख़ुद हमारा ज़मीर ये दे कि हमने अपने बडों के रास्तों को छोड़कर अपने ज़मीर का सौदा कर लिया है और, प्रेम भाई चारा 'आपसी मेल जोल इंसानियत का सबक और गंगा जमनी तहज़ीब व प्यार जैसी ज़िम्मेदारी जो पुरखों ने हमें सौंपी थी। उसको नहीं निभा सके तो यक़ीन मानिये कुछ और तो दूर की बात। क्या हम इंसान कहलाने के भी हक़दार हैं?? और जो औलाद अपने बडों का कहना नहीं मानती उसे मैं नहीं सारी दुनिया नालायक़ औलाद कहती है।।। सबसे ज़्यादा ग़ौर करने वाली बात ये है कि।।
मसले इस लिए पैदा नहीं होते जब हालात बदलते हैं। बल्कि मसले इसलिए पैदा होते हैं जब इंसान अपनी ज़िम्मेदारी से भागता है या मुंह छुपाता है। किसी पढ़े लिखे इंसान ने दो जुम्ले इतने प्यारे कहे जो वाकई गागर में सागर हैं। उसने कहा था कि अगर हम समस्या का समाधान नहीं हैं! तो हम ही समस्या हैं।
कितनी हिकमत भरी गहरी बात है। लेकिन सवाल यह है कि हम कब अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास कर के नींद से जागेंगे। बडों ने तो अपने काम पूरी ज़िम्मेदारी के साथ ठीक वक्त पर कर के इंसानियत की भलाई और भाईचारे के लिए हर मुमकिन कोशिश कर के इस चमन को अपना सब कुछ दिया है। हमारा भी ये फ़र्ज़ है कि हम इस चमन की देखभाल के लिए हर वो कोशिश करें ताकि ये गुलशन और भी ख़ूबसूरत और ख़ुशनुमा। बेहतर हो इसके पेड़ पौधे फूल पत्तियाँ बूटे और डालियां सदा बहार रहें। ताकि आपसी भाई चारा। साम्प्रदायिक सौहार्द। क़ायम रहे और बडों से विरासत में जो गंगा जमनी तहज़ीब हमने पाई है। उसकी हिफाज़त भी हम कर सकें।। यक़ीनन हमारी आने वाली नस्लों के लिए इस से अच्छा और कोई तोह्फ़ा हो ही नहीं सकता।।। ख़ुदा हमेशा हमारे मुल्क को दुश्मनों की बुरी नज़र से बचाए। और हमें इसकी ख़िदमत की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन
अज़ __________
इरफ़ान नोमानी जाहिदी
बासनी नागौर राजस्थान
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